सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Chicken’s Neck): भारत की सबसे संवेदनशील 17 किमी चौड़ी सामरिक सीमा का सच

भारत के नक़्शे को अगर ध्यान से देखा जाए, तो पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को देश की मुख्य भूमि से जोड़ने वाली एक बेहद संकरी पट्टी नज़र आती है। सामरिक और सैन्य हलकों में इसे ‘चिकन नेक’ या सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Siliguri Corridor) कहा जाता है। यह मात्र ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की संप्रभुता और पूर्वोत्तर की जीवन-रेखा है।

सामरिक वास्तविकता: एक नज़र में

पश्चिम बंगाल के फाँसीदेवा और चोपड़ा के निकट इस गलियारे की न्यूनतम चौड़ाई महज़ 17 से 22 किलोमीटर रह जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी भी गंभीर सैन्य टकराव की स्थिति में आधुनिक भारी तोपखाना (Heavy Artillery) दोनों दिशाओं से इस पूरे गलियारे को अपनी मारक सीमा में ले सकता है।

तीन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा रणनीतिक दबाव

सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सबसे बड़ी संवेदनशीलता इसका भूगोल है। यह गलियारा एक साथ कई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के दबाव में साँस लेता है:

  • उत्तरी मोर्चा: उत्तर में नेपाल की सीमा और डोकलाम पठार के नज़दीक भूटान की तलहटी इसे सामरिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बनाती है।
  • दक्षिणी किनारा: दक्षिण में बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा इस गलियारे के समानांतर महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • प्राकृतिक चुनौतियाँ: तीस्ता, महानंदा और जलढाका जैसी अनियंत्रित हिमालयी नदियाँ मानसून के दिनों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन पैदा करती हैं, जिससे सैन्य लॉजिस्टिक्स और रसद आपूर्ति बनाए रखना एक दोहरी चुनौती बन जाता है।

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भारतीय सेना का अभेद्य सुरक्षा चक्र: 33 ‘त्रिशक्ति कोर’

इस जीवन-रेखा की हिफ़ाज़त का दायित्व भारतीय सेना की सुकना (Sukna) स्थित 33 ‘त्रिशक्ति कोर’ (Trishakti Corps) के कंधों पर है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस इलाके में सेना न सिर्फ पारंपरिक रक्षात्मक मुद्रा में रहती है, बल्कि किसी भी संभावित खतरे को विफल करने के लिए आक्रामक काउंटर-स्ट्राइक क्षमताओं से लैस है।

हाल के वर्षों में भारत सरकार ने इस कॉरिडोर पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स जैसे कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और बांग्लादेश के रास्ते वैकल्पिक ट्रांजिट रूटों पर तेज़ी से काम किया है।

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